वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Tuesday, 1 January 2013

हाइकु,ताँका दामिनी को समर्पित



दामिनी के शोक में नव-वर्ष नहीं मना रही हूँ। मेरे उद्‍गार हाइकु और ताँका में पढ़िए -

१)
आ नव-वर्ष
क्षुब्ध भारतवर्ष
ला न्याय, हर्ष !

२)
नारी-सम्मान
नव-वर्ष संकल्प
हर नर का !

३)
मैं मुहाफ़िज़
न होंगी बेआबरू
बेटियाँ प्यारी।

४)
बर्फ़ हुई जो
पिघले संवेदना
मेरी-तुम्हारी !

५)
बेहतर हो
कल मेरा-तुम्हारा
शुभकामना !

ताँका


उबरना है
शर्म से क्षोभ से तो
करो ये वादा
दामिनी का इंसाफ़
रहे ध्येय हमारा।

- शील

Tuesday, 25 December 2012

बदलनी होगी अब तस्वीर



युवा शक्‍ति को नमन! दामिनी/निर्भया को सलाम और उस बच्ची की सलामती की दुआ के साथ आज की प्रस्तुति -

कुहासा है या
घनीभूत हो गई है पीर
या शर्मसार हो रवि
छिप गया है घन के चीर

कौंध उठी है दामिनी
चुक गया है सबका धीर
बेटियों पर बरसाएँ डंडे
कैसे भैया पुलिसिया वीर?

जनता हुँकार उठी है
नहीं देश किसी की जागीर
बहुत सहा है हमने लेकिन
बदलनी होगी अब तस्वीर

-
शील

चित्र - साभार गूगल

Friday, 21 December 2012

हर शब्द हुंकार है






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 हर शब्द हुंकार है
हर शब्द ललकार
शक्‍ति का निनाद है
बदलाव का शंखनाद

बहुत सहे आघात
करना होगा प्रतिघात
कुंकुम, महावर नहीं
शस्त्र ही तेरा शृंगार

दामिनी की तरह
हर स्‍त्री को लड़ना है
नहीं मुँह ढाँप
अनाचार सहना है

केवल नारे, विरोध नहीं
अब लड़ कर दिखाना है
काल हूँ तेरी
हर वहशी को बताना है

-
शील

चित्र : साभार गूगल
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Thursday, 20 December 2012

इनकार है


बहुत कुछ घुट रहा है अंतस में पिछले दो दिनों से -


सदियों से रिसी है
अंतस में ये पीड़
स्‍त्री संपत्ति
पुरूष पति
हारा जुए में
हरा सभा में चीर
कभी अग्निपरीक्षा
कभी वनवास
कभी कर दिया सती
कभी घोटी भ्रूण में साँस


क्यों स्वीकारा
संपत्‍ति, जिन्स होना
उपभोग तो वांछित था
कह दे
लानत है
इस घृणित सोच पर
इनकार है
मुझे संपत्‍ति होना


तलाश अपना आसमां
खोज अपना अस्तित्‍व
अब पद्‍मिनी नहीं
लक्ष्मी बनना होगा
जौहर में स्वदाह नहीं
खड्‍ग ले जीना होगा

-
शील

Wednesday, 19 December 2012

हे सृजनहार




आज विधाता से एक सवाल पूछने का बड़ा मन कर रहा है -

हे सृजनहार
पूछती हूँ
आज एक सवाल
क्यों लिख दी तूने
जन्म के साथ
मेरी हार ?


सौंदर्य के नाम पर
अता की दुर्बलता
सौंदर्य का पुजारी
कैसी बर्बरता !
इंसां के नाम पर
बनाए दरिंदे
पुरूष बधिक
हम परिंदे
नोचे-खसोटें
तन, रूह भी लूटें
आ देख
कैसे, कितना हम टूटे !

(
लिखी जा रही कविता से...)
-शील