वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Friday, 3 August 2012




सुहाना
मौसम ! आठवीं मंज़िल से इस भीगे-भीगे मंज़र को देख रही हूँ और प्रकृति ने दे ही दी कुछ पंक्तियाँ सुबह-सवेरे -

भीगा अंबर
भीगी है धरा
भीगे तरूवर
खड़े हैं साधे मौन
भीगी-भीगी घास
भिगो गई मुझे !

निस्पंद कुसुम
फैली सुवास
पी नहीं पास
अँसुवन से
सील गया मन
ये बरसात
देती है पीर
तेरे बिन
सुन सजन

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर सुशीला जी....
    प्यारी सी रचना...

    अनु

    ReplyDelete
  2. अहसास जगाती सुंदर रचना,,,,सुसीला जी बधाई

    RECENT POST काव्यान्जलि ...: रक्षा का बंधन,,,,

    ReplyDelete
  3. कल 05/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (05-08-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  5. सात दिन से सब कुछ मौन भीग रहा है हमारे सहर में भी....
    सुंदर अभिव्यक्ति....
    सादर।

    ReplyDelete
  6. सावन इस पीर को बढा देता है ... कोमल एहसास लिए है ये रचना ...

    ReplyDelete
  7. मन को भिगो जाती हैं कभी कभी ये बारिश .....
    सुंदर भाव !

    ReplyDelete