वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |
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Saturday, 16 June 2012

ताँका - छोड़ चले नीड़ !


लीजिए मित्रो आज ताँका लेकर हाज़िर हूँ । सबसे पहले जानकारी -

ताँका
ताँका  जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य शैली है । इस शैली को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी  के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी  हुआ करते थे । हाइकु का उद्भव इसी से हुआ । इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है।
ताँका  पाँच पंक्तियों और 5+7+5+7+7= 31 वर्णों के लघु कलेवर में भावों को गुम्फित करना सतत अभ्यास और सजग शब्द साधना से ही सम्भव  है ।
इसमें यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि इसकी पहली तीन पंक्तियाँ कोई स्वतन्त्र हाइकु है । इसका अर्थ पहली से पाँचवीं पंक्ति तक व्याप्त होता है ।
रामेश्वर  काम्बोज  'हिमांशु ' ; डॉ . हरदीप  कौर  सन्धु


१)
चोंच से चुग्गा
देख-देख के जीती
चूज़े सयाने
उग आए जो पंख
छोड़ चले वो नीड़ !

२)
वृक्ष मचान
कटती दोपहर
बेर, कटारे
स्वाद जहां से न्यारे
जहां जिसपे वारे !

३)
आए बदरा
झूम के नाचा मोर
नंग-धड़ंग
कागज़-कश्‍ती हाथ
पुलका बचपन!

४)
बरसे मेघ
साथ ले हल-बैल
चला खेत को
अन्न उगाने वाला
पेट बाँध के जीता !

-सुशीला शिवराण