वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Saturday, 4 June 2011

मीता



मीता



दुनिया में जितनी भीड़ है 
मनवा में उतनी पीड़ है ..........

मर्म इसका, दर्द इसका, मैंने यहीं जाना 
भीड़ में इन्सान हो सकता अकेला, माना !


कार्य-क्षेत्र की इन दरो-दीवारों के बीच 
अपने से चेहरों, अजनबी भाषा के बीच !


मन हुआ नितांत अकेला 
दिन सूने और दिल रीता !


जीवन के मरू में, तुम आई बन बरखा 
खुशियों का झोंका, तुम ही तो लाई मीता !


मुरझाए-से दिल में, तुम ही लाई नव-उल्लास 
कैसे मैं भूलूंगी , यह वक्त, यह हास-परिहास !


कानों में गूंजेगी जब, तुम्हारी मीठी खिलखिलाहट 
दिल पर दोगी दस्तक, मन में तुम्हारी ही आहट !

बिन तुम्हारे कैसे कहूं , यहाँ होगी कितनी विरानगी 
मेरे ही जीवन में आया ठहराव, बाकी वही रवानगी !


जाओ, निभाओ नेवी का दस्तूर, ओ मेरी मीता !
इस खुशनुमा झोंके की लेकिन, मुझे सदा ही प्रतीक्षा !



2 comments:

  1. बिन तुम्हारे कैसे कहूं , यहाँ होगी कितनी विरानगी
    मेरे ही जीवन में आया ठहराव, बाकी वही रवानगी !
    बहुत ही प्यारी कविता !
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

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  2. धन्यवाद सचिन !

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