वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Saturday, 26 May 2012

मैं, उम्मीदें


मैं
चंदन हूँ
आग हूँ 
सबने समझा राख
अंगार हूँ
बर्फ़-सी शीतलता
लावे-सी दहक हूँ
फूल पर शबनम
एक महक हूँ 
सबने समझा पीर
मैं शमशीर हूँ  !



उम्मीदें


ये तन्हाइयाँ
परेशानियाँ
दुश्‍वारियाँ
क्यूँ है गमनशीं
ए हमनशीं
क्या रूका है यहाँ
जो ये रूकेंगी
हो जाएँगी रूखसत
ज़रा पलकें उठा के देख
मेरी आँखों में तुम्हें
उम्मीदें दिखेंगी....
..
 

-सुशीला शिवराण

चित्र : साभार गूगल

15 comments:

  1. दोनों रचनाएँ हृदयस्पर्शी हैं

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  2. कल 27/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. उम्दा रचनाएँ हैं जो दिल को छू लेती हैं.

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  4. सुशीला जी आप की दोनों ही रचनाएँ बहुत सुन्दर और हृदयस्पर्शी हैं......सस्नेह..

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  5. आपकी दोनों ही रचनाओं ने दिल को छुआ,बहुत अच्छी प्रस्तुति,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

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  6. बहुत सुंदर सुशीला जी....

    मनभावन रचनाएँ....

    अनु

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  7. उम्दा रचनाएँ , सुशीला जी!

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति सुशीला जी!

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  9. बहुत सुन्दर रचना

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  10. सुंदर...सुशीला जी, उम्मीदों की झालर सजाए रखना, परेशानियाँ रुखसती की हमनशीं बनेँगीं...

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  11. sundar rachnayen. gaagar mein sagar

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  12. भावनाओ की बेहतरीन अभिव्यक्ति....
    बेहतरीन रचना...

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  13. दोनों रचनाएँ अति उत्तम, भावप्रण, शुभकामनाएँ.

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  14. सच है सभी परेशानियां एक दिन चली जाती हैं ... उम्मीद की किरण हमेशा रहनी चाहिए ... यही जीवन है ..
    दोनों रचनाये बहुत ही अच्छी हैं ...

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  15. उम्मीद ही तो वह ताक़त है ...जो बड़े से बड़े तूफ़ान का हौसला भी पस्त कर देती है ....सुन्दर !

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