वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Saturday, 21 April 2012

ज़िंदगी







मृगतृष्‍णा


नखलिस्तान..


किन-किन रूपों में बुलाती


लुभाती हो ज़िंदगी


दौड़ती हूँ बाँहों में भर लूँ


कुछ पल जी भर जी लूँ


सजाए थे जो सपन


हकीकत कर लूँ


अरमान से बढ़े कदम


तृप्‍ति की अभिलाष


मृगतृष्‍णा ही रही तुम


कायम रही प्यास !






-सुशीला शिवराण

10 comments:

  1. अरमान से बढ़े कदम
    तृप्‍ति की अभिलाष
    मृगतृष्‍णा ही रही तुम
    कायम रही प्यास !
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,...

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

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  2. मृगतृष्‍णा ही रही तुम... यही निष्कर्ष मिला

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  3. तृप्‍ति की अभिलाष

    मृगतृष्‍णा ही रही तुम

    कायम रही प्यास !
    बेहतरीन ।

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    1. ख़ूबसूरत भाव, सुन्दर रचना.

      कृपया मेरी १५० वीं पोस्ट पर पधारने का कष्ट करें , अपनी राय दें , आभारी होऊंगा .

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  4. अतृप्त ज़िंदगी .... सुंदर रचना

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  5. कल 23/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. जोंदगी भी तो खेल खेलती है हर पल ... अलग अलग तरह से ..

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  7. सुंदर भावनाओं की कोमल अभिव्यक्ति.

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  8. इसी को ज़िन्दगी कहते हैं ...किसीके हाथ नहीं आती ...सुन्दर रचना सुशिलाजी

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