वीथी

हमारी भावनाएँ शब्दों में ढल कविता का रूप ले लेती हैं।अपनी कविताओं के माध्यम से मैंने अपनी भावनाओं, अपने अहसासों और अपनी विचार-धारा को अभिव्यक्ति दी है| वीथी में आपका स्वागत है |

Friday, 9 August 2013

तो मेरी भी ईद हो




कर सको इक वादा
तो मेरी भी ईद हो

मैं कहूँ – ईद मुबारक
तुम कहो – तीज की बधाई
घेवर-सेवैयाँ मिल कर खाएँ
तो मेरी भी ईद हो


हिन्दुस्तान घर तुम्हारा
हर हिन्दुस्तानी भाई प्यारा
लाँघ सको मज़हब की दीवार
तो मेरी भी ईद हो

तुम्हें ख़ुदा का वास्ता
ज़िंदगी का अमन ही रास्ता
दे सको यह कौल अगर
तो मेरी भी ईद हो


- शील

चित्र : साभार गूगल

Sunday, 21 July 2013

हाइकु - मोहे तो मोहे












कुछ हाइकु - 

1
मिटे संशय
सद्‍गुरु की शरण
मन निर्भय ।

2
बोलें हैं नैन-
प्रीत की रीत यही
शब्द हैं मौन।

3.
रूहानी रिश्ते
जन्मों के हैं बंधन
तोड़े न टूटें ।

4
उड़ रे कागा
आते होंगे पाहुना
लीपूँ अँगना ।

5

बंद थी मुट्ठी
फिसलती ही गईं
रेत-सी साँसें ।
6
यही है प्यार
आत्मा से जुड़े आत्मा
देह के पार ।

7
जुस्तजू तेरी
तिश्नगी में हैं साथ
उम्मीदें मेरी।

8
गहना नहीं
मोहे तो मोहे सखी
छब पिया की।

9.
रिश्ते जन्मों के
सँजोए हैं दिल में
मोती सीप के।


10.

तेरी बहियाँ

ख़ामोशी करे बातें

सारी रतियाँ ।

- शील

Friday, 21 June 2013

मैं वसुधा



मैं वसुधा
तुम्हारी धमनियों में
अन्न, जल, रस बन
सदियों से प्रवाहित हूँ
कभी फूल
कभी इत्र बन
सुवासित किया तुम्हारा प्रेम
पहाड़ों पर तुम्हारे प्रणय की साक्षी
औषधि से दिया आरोग्य
सींचती रही
पोसती रही
मैं जीवनदायिनी
निस्वार्थ
आनंदित ।

तुम मनुष्य
तुम्हारा स्वार्थ
तुम्हारी क्षुधा
नोचती रही मुझे
किए पहाड़ निर्वसन
कितने ही बाँधों में
बाँध दिया मेरा जीवन-प्रवाह
मेरे तन को दिए असंख्य घाव
किया रूप को कुरूप ।

तुम्हारा ईश्‍वर
कब तक मूक रह
देखता तुम्हारी कृतघ्‍नता
जीवनदायिनी के साथ
तुम्हारा छल, घात
चुक गया धैर्य
मिला प्रतिदान
तुम्हारे घात का
प्रतिघात ।

न ईश्‍वर सोया
न मैं हुई विध्‍वसंक
मत डाल हमारे कंधों पर
अपने पाप का बोझ
लालच में लंपट हो
जिस विनाश-मार्ग पर चल पड़ा था
उसकी परिणति
और क्या होती ?

- शील

चित्र : साभार गूगल

Sunday, 16 June 2013

जब माँ थी; मालिक थे पिता

  • मेरी कलम से पिता जी के लिए - Happy Father's Day पापा !
    जिस पदचाप से
    चौकन्नी हो जाती हवेली
    जिस रौबीली आवाज़ से
    सहम जातीं भीतें
    दुबक जाते बच्चे
    पसर जाती खामोशी
    समय के कुएँ में
    पैठता गया रौब
    अब प्रतिध्वनि पर
    नहीं ठहरता कुछ
    चलता रहता है यंत्रवत
    दैनिक कार्यकलाप।

  • ~~~~~~~~~~~~~~~~~

    जब माँ थी
    मालिक थे पिता
    घर-बार-संसार
    चलता मर्ज़ी से
    माँ के जाते ही
    मुँद गए किवाड़
    अनाथ हुआ घर
    आधे-अधूरे
    हो गए पिता।
    -शील

Wednesday, 12 June 2013

मेरे पावस


तुम्हारे प्रेम ने
पुरवा बन
जब-जब छुआ मुझे
झंकृत हुए मन के तार
झूम उठा अंग-प्रत्यंग
गा उठा मन 

गीत प्रीत के ।

तुम्हारे प्रेम ने
पावस बन
जब-जब भिगोया मुझे
जी उठी मैं
ज्यों तपती रेत
हो जाती है तृप्त
झमाझम बारिश में
आनंद से विभोर
हुलस उठा मन
नाचा बन मोर।

तुम्हारा प्रेम
मानता है सब नियम
नहीं रहता स्थायी
बदलता है प्रकृति-सा
हो जाता है पतझर
झर जाते हैं अहसास
जड़ हो जाते
मन-आत्मा
नहीं पोसता
तुम्हारा प्रेम

हो जाती हूँ ठूँठ
सहती मौसम की मार
निर्विकार

दग्ध करते अंतस 
आँधियाँ, लू के थपेड़े
खड़ी हूँ उन्मन
चिर-प्रतीक्षा में
कब आओगे
मेरे पावस?

- शील

चित्र - साभार गूगल